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जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

  जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..   किश्तों में..सफर में कट गई ज़िदगी जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी.. मां करती रही इंतजार.. बच्चे मिलने को तरस गए.. देखते-देखते रास्ता..पापा गुज़र गए.. किचन में खड़े-खड़े बीवी की थम गई ज़िदगी.. जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी.. इस हफ्ते क्लब जाएंगे... मिलके सब मुसकराएंगे... सोचते रहे क्या-क्या.. ना मिली फुर्सत कभी..हारकर बुझ गई ज़िदगी... जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी.. इस दौर में कहां मै अकेला.. भीड़ में मेरे जैसा हर एक चेहरा.. सब ने उड़ना चाहा .. मगर.. डोर से कट कर कटी पतंग बन गई ज़िदगी... जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी.. सब जरूरी है सब लाना है.. क्रैडिट कार्ड है ना..बस स्वैप कराना है.. गैर ज़रूरी सामान का बाज़ार बन गई ज़िदगी.. जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी.. दोस्त बिछड़ गए .. रिश्ते व्हॉट्सेप बन गए... क्या खुशियां – क्या गम... कांधा देने से भी महरूम रह गई ज़िदगी.. जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..      

मैं इरफान बोल रहा हूं

 ओ हैल्लो ..भइया मैं इरफान बोल रहा हूं...मेरी आंखों ने कुछ सपने देखे...वो आंखें जो मेरी जुबां खुलने से पहले बोल देती थीं..ये आंखें जिनमें सपने देखते देखते काजल ऐसे समाया कि लगा मुंबई की बरसाती पीकू भी इन्हें अब मकबूल बनने से रोक नहीं सकती...सपनों की नगरी मुंबई...यहां की गलियों को इससे पहले मैं सलाम करता इन्होने मुझे सलाम किया और सलाम बांम्बे नाम की फिल्म ने मुझे पहला मौका दिया आप सभी को हासिल करने का...जी हां हासिल ही थी वो कहानी जिसमें पहली बार मुझे लोग डॉयलोग बाज़ लौंडा कहने लगे थे...वो नेता नगरी की कहानी जिसे मैने कभी जिया ही नही अपनी रियल लाईफ में... फिर क्या था अगली ही सिनेमां में परदे पर जब विलेन बन कर आया तो लोग मेरी चंद्रकांता वाली अय्यारी भूल गये.... ये गलियां मुझे रेगिस्तान में वापस जाने नहीं दे रहीं थी...लोगों की सीटियां मेरे कानों में रातों गूंजती रहती...और अपनी डॉयलाग बाजी बढ़ती चली गयी...साला मेट्रो सिटी किसे कहते हैं कभी नहीं जाना था..लेकिन जब जानने की कोशिश की तो फिल्म लाइफ इऩ आ मेट्रो से लोगों की आंखों का काजल चुरा लिया...और इसने मेरे जैसे सिंपल लुक वाले बंदे को नय...