मैं इरफान बोल रहा हूं
ओ हैल्लो ..भइया मैं इरफान बोल रहा हूं...मेरी आंखों ने कुछ सपने देखे...वो आंखें जो मेरी जुबां खुलने से पहले बोल देती थीं..ये आंखें जिनमें सपने देखते देखते काजल ऐसे समाया कि लगा मुंबई की बरसाती पीकू भी इन्हें अब मकबूल बनने से रोक नहीं सकती...सपनों की नगरी मुंबई...यहां की गलियों को इससे पहले मैं सलाम करता इन्होने मुझे सलाम किया और सलाम बांम्बे नाम की फिल्म ने मुझे पहला मौका दिया आप सभी को हासिल करने का...जी हां हासिल ही थी वो कहानी जिसमें पहली बार मुझे लोग डॉयलोग बाज़ लौंडा कहने लगे थे...वो नेता नगरी की कहानी जिसे मैने कभी जिया ही नही अपनी रियल लाईफ में... फिर क्या था अगली ही सिनेमां में परदे पर जब विलेन बन कर आया तो लोग मेरी चंद्रकांता वाली अय्यारी भूल गये.... ये गलियां मुझे रेगिस्तान में वापस जाने नहीं दे रहीं थी...लोगों की सीटियां मेरे कानों में रातों गूंजती रहती...और अपनी डॉयलाग बाजी बढ़ती चली गयी...साला मेट्रो सिटी किसे कहते हैं कभी नहीं जाना था..लेकिन जब जानने की कोशिश की तो फिल्म लाइफ इऩ आ मेट्रो से लोगों की आंखों का काजल चुरा लिया...और इसने मेरे जैसे सिंपल लुक वाले बंदे को नया चेहरा दे दिया...अब क्या था बात चल रही थी पॉर्लियामेंट के डकैतों की...देखो भइया ये हम नहीं कह रहे ये तो हमारी किस्मत की रूह कह रही थी..तो हम भी हनहना के बन गये पान सिंह तोमर...और ऐसी दौड़ लगाई कि इस बार..बाप रे बाप वो कहते हैं न बड़ा वाला परदा..स्टेज..बड़ी बड़ी नौटंकी वाली...हीरो हिरोइन की डुप्लीकेट तालियां होती हैं..वहां हम बन गये साल को सबसे बड़े हीरो...नाम था पान सिंह तोमर..अब क्या था हमारी भूख थी कि शांत होने का नाम नहीं ले रही थी..तो सोचा थोड़ा लंच कर लिया जाए...भइया हम तो गये थे लंच करने और सामने था हमारा प्यारा लंचबॉक्स..वो कहानी जिसमें आम के अचार का स्वाद था...देसी घी के पराठे की महक महक थी...सामने थी कभी न मिलने वाली मेरी जिंदगी का नमकीन किरदार...आप लोगों को ये इरफान अब आपके साथ बस में सफर करने वाला दोस्त बन गया...ये सफर और ये बस कब मुझे कश्मीर की वादियों में ले गयी पता ही नहीं चला...और इस बार मैं मिस्टर इंडिया बन गया शाहिद के कंधो पर हैदर की कड़कड़ाती ठंडक में...वाह क्या गजब का चाय का प्याला था...भइया हम तो उसे चाय ही बोलेंगे...क्योंकि वो चाय ही पीते पीते हम कब पतले लेकिन रौबदार थानेदार बने पता ही नहीं चला...अरे यार गुंडे का बात कर रहा..तुम लोग भी ना रहां हमें सिंघम और चुलबुल पांडे समझने लगे...कहां हम और कहां वो...बाकि एक बात तो हो गजब हीरो गिरी दिखाई थी इन गुंडो ने...पर हम भी गर्दा उड़ा दिए...माने नही...गुंडागर्दी के बाद हम भी बन गये आशिक..क्या करें अब यही बचा था...100 परसेंट सच बोल रहे हैं हमें तो पीकू से मोहब्बत हो गयी....साला 90 साल के बच्चे को ऐसा एडाप्ट किया कि लगा सच में डेथ और शिट कभी भी..कहीं भी...और किसी को भी आ सकती है...हमें तभी पता चला कि हम भी फंस गये यार कैंसर जैसे दोस्त के चक्कर में..जो हमें अपने साथ ही लेकर जाएगा..हम भी कहां मानने वाले...सोचा कि अंग्रजी तो हमें मिली नही हिंदी में ही अपनी कहानी का आखिरी किस्सा बताया जाए आपको..फिर क्या टहते टहलते पहुंच गये जिंदगी की पाठशाला में पढंने के लिए...वो भी सरकारी स्कूल में ... हिंदी मीडियम में ...सही बोलूं तो ट्यूशन खत्म करते करते सांस उखड़ रही था..शायद अपनी ही नजर लग गयी थी..इस बार हमारी आंखों का काजल इस नजर से बचा नहीं पाया..साला इस दोस्त (कैंसर) को मोहब्बत ही ऐसी हुई थी हमसे..अच्छा देखो हमें भी मोहब्बत थी इस जिंदगी से इस लिए जाने दिया...ज़िद होती तो बाहों में होती...वैसे अभी तो जा रहा हूं ...अगले साल फिर आंउगा...सही है गुरू...लव यू...
आप का फीडबैक जरूरी है ।।
जवाब देंहटाएंलिखने की शैली बहुत ही शानदार और अद्भुत है शब्दों को जो पिरोया गया है उसका लाजवाब प्रदर्शन दिखाई दे रहा है
जवाब देंहटाएंधन्यवाद मोहित। ।
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