जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

 


जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

 

किश्तों में..सफर में कट गई ज़िदगी

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

मां करती रही इंतजार..

बच्चे मिलने को तरस गए..

देखते-देखते रास्ता..पापा गुज़र गए..

किचन में खड़े-खड़े बीवी की थम गई ज़िदगी..

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

इस हफ्ते क्लब जाएंगे...

मिलके सब मुसकराएंगे...

सोचते रहे क्या-क्या..

ना मिली फुर्सत कभी..हारकर बुझ गई ज़िदगी...

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

इस दौर में कहां मै अकेला..

भीड़ में मेरे जैसा हर एक चेहरा..

सब ने उड़ना चाहा .. मगर..

डोर से कट कर कटी पतंग बन गई ज़िदगी...

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

सब जरूरी है सब लाना है..

क्रैडिट कार्ड है ना..बस स्वैप कराना है..

गैर ज़रूरी सामान का बाज़ार बन गई ज़िदगी..

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

दोस्त बिछड़ गए ..

रिश्ते व्हॉट्सेप बन गए...

क्या खुशियां – क्या गम...

कांधा देने से भी महरूम रह गई ज़िदगी..

जाने कितने अरमानों के पर कतर गई ज़िदगी..

 


 

 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही बेहतरीन कविता ....

    अपनी जिंदगी को और हर पल को बहुत अच्छे से जीना चाहिए कविता का सार यही है

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